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पहनने का तरीक़ा

गोरेउम कैसे बाँधें, और आम ग़लतियाँ

कौन सी डोरी कौन सी है, नीचे चीमा किस ओर लपेटी जाती है, और वे ग़लतियाँ जिनसे जोगोरी बेढंगी बैठती है।

गोरेउम कैसे बाँधें, और आम ग़लतियाँ

गोरेउम (고름) कपड़े की उन दो डोरियों को कहते हैं जो जोगोरी (저고리) यानी छोटी ऊपरी जैकेट, या दुरुमागी (두루마기) को बंद रखती हैं। इस पोशाक में बटन नहीं होते, इसलिए ये डोरियाँ सजावट नहीं, ढाँचे का काम करती हैं। कोरियाई संस्कृति विश्वकोश गोरेउम को गोर्यो काल के अंत से जोड़ता है, जब जोगोरी छोटी हुई और उससे पहले बाँधी जाने वाली पेटी चलन से हट गई; जोसोन काल के अंत में जब स्त्रियों की जोगोरी बहुत छोटी हो गई, तो ये डोरियाँ चौड़ी और लंबी होती गईं। शुरुआत करने वालों की ज़्यादातर दिक़्क़त गाँठ के दौरान नहीं, उससे पहले पैदा होती है।

डोरियाँ लंबी और छोटी होती हैं, बाईं और दाईं नहीं

  • लंबी डोरी गोतगित (겉깃) से लटकती है, यानी कॉलर के बाहरी आधे हिस्से से, जो ऊपर पड़ता है।
  • छोटी डोरी आनगित (안깃) से लटकती है, यानी कॉलर के भीतरी आधे हिस्से से, जो नीचे दबता है।

इन्हें बाईं और दाईं कहकर याद रखेंगे तो पुरुषों की जोगोरी या दुरुमागी (두루마기) यानी लंबा ओवरकोट पहनते ही यह याद टूट जाएगी। इसके बजाय लंबाई मिलाकर देखिए। दुरुमागी में, और कुछ जोगोरी में भी, एक पतली सोकगोरेउम (속고름) होती है, यानी भीतर वाले पल्ले के लिए भीतरी डोरी; पहले उसे बाँधिए, वरना बाहर की जोड़ी सीधी नहीं बैठेगी।

पहले चीमा और उसकी मालगी सँभालिए

मालगी (말기) चीमा (치마) यानी लपेटदार स्कर्ट के सबसे ऊपर लगी कमरपट्टी है। कोरिया क्राफ़्ट ऐंड डिज़ाइन फ़ाउंडेशन के संस्कृति पोर्टल के अनुसार, बीसवीं सदी में लड़कियों की स्कूल वर्दी के असर से इस कमरपट्टी को बंडी जैसे चोली-रूप में बदल दिया गया।

  • पहले सोकबाजी (속바지) यानी चौड़ी भीतरी पतलून और सोकचीमा (속치마) यानी पेटीकोट पहनिए, फिर बोसोन (버선) मोज़े — चीमा पहन लेने के बाद झुकना मुश्किल हो जाता है। पेटीकोट के बिना बाहरी चीमा को कोई आकार नहीं मिलता।
  • खुली जगह पीछे रहनी चाहिए, और बाहरी पल्ला घूमकर पहनने वाली की बाईं ओर आकर ख़त्म होता है — पीछे से देखने वाले को यह दाईं ओर दिखेगा — और पीछे के बीच वाले हिस्से पर क़रीब 7-10 सेमी चढ़ जाता है।
  • डोरियाँ छाती के ऊपर बाँधिए और गाँठ को घुमाकर एक तरफ़ कर दीजिए। आगे बीचोंबीच पड़ी गाँठ जोगोरी को बाहर की ओर उभार देती है।

बाँधने का तरीक़ा

  • एक-एक डोरी दोनों हाथों में लीजिए और छोटी को लंबी के आर-पार रखिए।
  • छोटी को लंबी के नीचे से घुमाकर वापस ऊपर निकालिए, फिर खींचकर एक अधगाँठ बना लीजिए।
  • एक डोरी को मोड़कर फंदा बनाइए, जिसे गो (고) कहते हैं।
  • दूसरी डोरी को उस फंदे में से निकालिए।
  • दोनों को एक साथ खींचकर कसिए और फंदे को इस तरह बैठाइए कि उसका रुख़ पहनने वाले की बाईं ओर हो।

वही पोर्टल आख़िरी तीन क़दमों के दो रूप देता है: या तो फंदा छोटी डोरी से बने और लंबी उसमें से निकले, या नीचे पड़ी लंबी डोरी से फंदा बने और छोटी उसके चारों ओर लपेटकर बाहर आए। दोनों में अंत एक जैसा है, एक फंदा और एक लटकता सिरा; उस सिरे को खींचते ही पूरी गाँठ खुल जाती है।

आम ग़लतियाँ

  • जूते के फ़ीते जैसी दो फंदों वाली गाँठ। पारंपरिक तरीक़े में फंदा एक ही होता है।
  • जैकेट को उलटी दिशा में बंद करना। आज की जोगोरी दाईं ओर बंद होती है।
  • दोंगजोंग (동정) का गले से हट जाना, यानी कॉलर के किनारे पर सिली सफ़ेद पट्टी का। कुछ भी बाँधने से पहले इसे गले से सटा लीजिए।
  • सिरों की लंबाई न मिलाना। दोनों डोरियाँ लगभग बराबर लंबाई तक गिरनी चाहिए, और फंदा सोपसोन (섶선) यानी आगे की तिरछी सिलाई से थोड़ा-सा बाहर निकला रहे।
  • पेटीकोट छोड़ देना, और फिर हैरान होना कि पूरी तराश चपटी क्यों लग रही है।

जहाँ चलन सचमुच अलग-अलग है

बंद करने की दिशा हमेशा एक जैसी नहीं रही। पोशाक पर हुए एक अध्ययन का कहना है कि ज्वाइम (좌임) यानी बाईं ओर की बंदिश गोगुर्यो के शुरुआती दौर के बाद ख़त्म हो गई और अब सिर्फ़ योमसेउप (염습) यानी मृतक को कपड़े पहनाने की रीति में बची है; वहीं सांगम्युंग विश्वविद्यालय की पार्क सोन-ही बताती हैं कि गोगुर्यो के मक़बरों के भित्तिचित्रों में दोनों दिशाएँ साथ-साथ दिखती हैं। बची हुई पोशाकों में चीमा का चढ़ाव और चुन्नटों की दिशा भी अलग-अलग मिलती है। ग्योंगबोकगुंग के निःशुल्क प्रवेश के नियम इतना ही माँगते हैं कि ऊपर और नीचे, दोनों कपड़े हों और जोगोरी लपेटदार कॉलर वाली हो, पर वे साफ़ कहते हैं कि डोरियाँ और गाँठ बाँधने का तरीक़ा मायने नहीं रखता। बाक़ी सब हाथ की आदत है, और वह जैकेट कंधों पर डालकर ही जल्दी आती है।

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