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पहनने का तरीक़ा

स्त्रियों का हनबोक कैसे पहनें

भीतरी पतलून और मोज़ों से लेकर चीमा किस ओर लपेटी जाती है और जोगोरी कैसे बाँधी जाती है, सब पहनने के क्रम में।

स्त्रियों का हनबोक कैसे पहनें

स्त्रियों का हनबोक (한복), यानी कोरिया की पारंपरिक पोशाक, भीतर से बाहर की ओर और नीचे से ऊपर की ओर पहनी जाती है। एक क़दम भी छूटा तो चीमा शरीर पर घूम जाती है और जोगोरी पीछे को सरक जाती है। नीचे दिया क्रम उन्हीं टुकड़ों का है जो किराए के सेट में आम तौर पर साथ आते हैं।

भीतरी पतलून, पेटीकोट और मोज़े

  • सोकबाजी (속바지), चौड़ी भीतरी पतलून, सबसे पहले पहनी जाती है। यह चीमा को टाँगों से चिपकने नहीं देती और चलते समय उसकी रेखा सँभाले रखती है।
  • सोकचीमा (속치마) यानी पेटीकोट उसके ऊपर आती है। यह बाहरी चीमा से दो-तीन सेंटीमीटर छोटी कटी होती है, इसलिए इसका घेरा बाहरी घेरे के नीचे छिपा रहता है।
  • बोसोन (버선), कोरियाई तराश वाले मोज़े, चीमा से पहले पहन लेना आसान रहता है। इनमें बायाँ और दायाँ अलग होता है: सुनुक (수눅) यानी अँगूठे तक जाती बीच की सिलाई का सीवन बाहर की ओर रहता है।

चीमा पीछे से लपेटी जाती है

चीमा (치마), लपेटदार स्कर्ट, बग़ल में नहीं बल्कि पीठ के पीछे बंद होती है। खुली जगह को रीढ़ के ठीक बीच रखिए, दायाँ पल्ला ऊपर उठाकर आर-पार लाइए ताकि उसका किनारा आपकी बाईं ओर आकर ख़त्म हो, और कमर की डोरियाँ छाती के ऊपर बाँधिए। गाँठ को बीच से थोड़ा हटाकर रखने से वह जोगोरी के नीचे उभरती नहीं। कोरियाई पोशाक की गाइडें इसी दिशा को मानक मानती हैं और समझाती हैं कि बायाँ हाथ पल्ला पकड़े रहता था ताकि दायाँ हाथ काम के लिए खाली रहे। हालाँकि जोसोन काल का चलन एक जैसा नहीं था, और वही स्रोत यह भी दर्ज करते हैं कि गिसेंग सादेबू घरानों से उलटी दिशा में लपेटती थीं। आजकल ज़्यादातर स्कर्टों में जो कंधे की पट्टियाँ होती हैं, वे ओक्केहोरी (어깨허리) कहलाती हैं; इन्हें 1914 में इह्वा हाकतांग में बनाया गया और 1910 तथा 1920 के दशकों में इनका चलन फैला, ताकि चीमा नीचे न सरके। पुरानी स्कर्टों में सिर्फ़ कमरपट्टी और डोरियाँ होती थीं।

जोगोरी और गोरेउम

  • जोगोरी (저고리), छोटी ऊपरी जैकेट, इस तरह बंद कीजिए कि आगे का बायाँ पल्ला (섶, सोप) दाएँ के ऊपर पड़े। दाईं ओर मुड़ने वाली इस बंदिश को उइम (우임) कहते हैं।
  • जैकेट को आगे की ओर तब तक खींचिए जब तक दोंगजोंग (동정), यानी कॉलर पर सिली सफ़ेद पट्टी, गले से न छू जाए; फिर दोनों कॉलर-किनारों को एक सीध में कर लीजिए।
  • जैकेट के आगे सिली दोनों गोरेउम (고름) डोरियाँ हाथ में लीजिए। छोटी को लंबी के ऊपर रखकर एक बार गाँठ लगाइए।
  • छोटी गोरेउम से एक गोल फंदा बनाइए और लंबी को उसमें से निकालिए।
  • लंबी गोरेउम को बाईं ओर खींचते हुए छोटी को नीचे की ओर कसिए, फिर दोनों को सीधा लटकने दीजिए।

पारंपरिक संस्कृति पोर्टल इसका उलटा तरीक़ा भी देता है, जिसमें फंदा लंबी गोरेउम से बनता है और छोटी उसके चारों ओर लपेटी जाती है।

आख़िरी फ़िट बैठाना

जोगोरी को आगे खींचिए ताकि कंधे की सिलाइयाँ पीछे न खिसकें, और छाती पर बची ढील को गर्दन के पास से काँख की ओर तिरछा मोड़कर लिटा दीजिए। गर्मी के लिए जोगोरी के ऊपर बेजा (배자) यानी बिना बाँह की बंडी पहनी जा सकती है; बाहर निकलते समय दुरुमागी (두루마기) यानी लंबा ओवरकोट सबसे आख़िर में पहना जाता है।

पुराने ज़माने की परतें कैसी थीं

जोसोन काल की स्त्रियाँ चीमा के नीचे कहीं ज़्यादा कपड़े पहनती थीं: दारिसोकगोत (다리속곳), सोकसोकगोत (속속곳), सोकबाजी और दानसोकगोत (단속곳) — परत पर परत। औपचारिक पोशाक में मुजिगी (무지기) और जुड़ जाता था: रेमी के बारह पाट, तीन, पाँच या सात जैसी विषम संख्या की तहों में, जो कमर के पास चीमा को फुला देते थे। इन परतों का क्रम स्रोतों में थोड़ा-थोड़ा अलग मिलता है। आज के दो टुकड़े उसी ढेर के बचे हुए हिस्से हैं, और हनबोक में बीती एक दोपहर यह क्रम किसी भी वर्णन से जल्दी सिखा देती है।

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