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हनबोक की तराश कैसे बदलती गई

पंद्रहवीं सदी की क़ब्रों से मिले कपड़ों से लेकर आज के महल-प्रवेश के नियमों तक, पाँच सदियों में हनबोक के अनुपात कैसे बदले।

हनबोक की तराश कैसे बदलती गई

हनबोक का ढाँचा पाँच सदियों तक स्थिर रहा: जोगोरी (저고리) यानी छोटी ऊपरी जैकेट, चीमा (치마) यानी लपेटदार स्कर्ट, बाजी (바지) यानी ढीली पतलून, और पो (포) यानी बाहरी चोगा। लंबाइयाँ और घेरे स्थिर नहीं रहे। तराश किस तरह बदलती गई, यह रहा।

जोसोन का आरंभिक काल: लंबा और ढीला

पंद्रहवीं और सोलहवीं सदी की क़ब्रों से मिली स्त्रियों की जोगोरी आज पहनी जाने वाली किसी भी जोगोरी से कहीं लंबी हैं। खुदाई में मिले नमूनों को लंबाई के हिसाब से दानजोगोरी (단저고리, 40 से 60 सेमी), जुंगजोगोरी (중저고리, 60 से 70 सेमी) और जांगजोगोरी (장저고리, क़रीब 80 सेमी) में बाँटा जाता है। कुछ चीमा जोनदानहुजांग (전단후장형) तराश की थीं, यानी आगे से छोटी और पीछे से लंबी। 18 खुदाई-स्थलों से मिले 48 नमूनों के एक अध्ययन में इन्हें पंद्रहवीं और सोलहवीं सदी में प्रचलित समारोही स्कर्ट माना गया है, जिनका चलन सत्रहवीं सदी में घटता चला गया।

जोसोन का उत्तर काल: ऊपर सँकरा, नीचे चौड़ा

जोगोरी के छोटा होने की शुरुआत आम तौर पर 1537 के आसपास मानी जाती है। यह चलन गिसेंग (기생), यानी गायन-नृत्य की पेशेवर कलाकारों, से फैला, और लंबाई के साथ-साथ बदन और आस्तीनें भी सँकरी होती गईं। विद्वान यी दोक-मू ने लिखा कि आस्तीनें इतनी तंग थीं कि बाँहें सुन्न पड़ जाती थीं और जैकेट उतारने के लिए सिलाई उधेड़नी पड़ती थी। कमर के नीचे उलटा हुआ: घड़े जैसी रूपरेखा बनाने के लिए एक के बाद एक परतें चढ़ाई जाती थीं।

  • दारिसोकगोत (다리속곳), सबसे भीतरी परत, जो अकसर बदली जाती थी
  • सोकसोकगोत (속속곳), त्वचा से लगी सूती परत
  • बाजी, जो जोसोन के उत्तर काल में बीच से खुली कटती थी
  • दानसोकगोत (단속곳), जो बाजी के ऊपर पहनी जाती थी ताकि घेरा बढ़े
  • चीमा को भरा-पूरा दिखाने के लिए एक पेटीकोट; उच्च वर्ग की स्त्रियाँ मुजिगी (무지기) पहनती थीं, और राजपरिवार की स्त्रियाँ औपचारिक पोशाक के साथ देश्युमचीमा (대슘치마)

राष्ट्रीय गुगाक केंद्र के कोरियाई पारंपरिक कलाओं के विश्वकोश के अनुसार, बंदरगाह खुलने के दौर तक गोरेउम (고름) यानी दोनों फ़ीतेदार डोरियाँ और दोंगजोंग (동정) यानी सफ़ेद कॉलर पट्टी, दोनों चौड़ी और लंबी हो चुकी थीं। सटीक माप पर मतभेद है। कोरियाई संस्कृति विश्वकोश राजा योंगजो के समय क़रीब 45 सेमी, राजा जोंगजो के समय 26 सेमी और 1890 तथा 1900 के दशकों में 19 सेमी बताता है; दूसरे विवरण 1580 के आसपास क़रीब 81 सेमी से घटकर 1900 के दशक तक 12 से 14.5 सेमी तक जाते हैं। दिशा पर सहमति है, आँकड़ों पर नहीं।

बंदरगाह खुलने का दौर: फ़रमान और स्कूल का आँगन

पुरुषों के कपड़े फ़रमान से बदले। 1884 के गापसिन वस्त्र सुधार ने हर पद के लोगों के लिए सँकरी आस्तीनें अनिवार्य कीं और उसका तीखा विरोध हुआ; 1895 के एउलमी सुधार ने अधिकारियों और आम लोगों, दोनों को काली दुरुमागी (두루마기) यानी सीधे कॉलर वाला ओवरकोट पहनाया, और यही आगे चलकर व्यावहारिक रूप से एकमात्र बाहरी चोगा बन गया।

स्त्रियों के कपड़े स्कूलों में बदले। 1910 में हानसोंग गर्ल्स हाई स्कूल ने सफ़ेद जोगोरी और काली तोंगचीमा (통치마) यानी एक ही टुकड़े की नलीदार स्कर्ट की वर्दी तय की। 1914 में इह्वा हाकतांग की वॉल्टर नाम की एक अध्यापिका ने ओक्केहोरी (어깨허리) बनाई, यानी कंधे की पट्टियों वाली कमरपट्टी, जो छाती को कसने वाली डोरी की जगह आई; और छात्राएँ हर छुट्टी में इसे अपने घरों तक ले जाती रहीं, जब तक यह हर जगह न पहुँच गई। जोगोरी 1920 के दशक से फिर लंबी होने लगी और 1930 के दशक तक क़रीब 26 सेमी पर आकर ठहर गई, जो आज के अनुपात के क़रीब है।

सुधरे हुए हनबोक से आज तक

1950 के दशक में बटन से बंद होने वाली छोटी आस्तीन की जोगोरी और तोंगचीमा का मेल — गर्मियों की यह शैली इह्वा वीमेंस यूनिवर्सिटी की अध्यक्ष और वहाँ की महिला प्राध्यापिकाओं ने शुरू की थी — पेशेवर स्त्रियों में फैला। ऐसे कपड़ों को 1980 के दशक तक गेर्यांग हनबोक (개량한복, सुधरा हुआ हनबोक) और उसके बाद सेंगह्वाल हनबोक (생활한복, रोज़मर्रा का हनबोक) कहा गया। आलोचकों का कहना था कि इन्होंने गित (깃) यानी कॉलर पट्टी और सोप (섶) यानी आगे चढ़ने वाला पल्ला छोड़कर चलने-फिरने की सहूलियत ख़रीदी है। हनबोक दिवस 1996 में तय हुआ और 1997 से 21 अक्तूबर को मनाया जाता है; हनबोक संवर्धन केंद्र 2014 में खुला, और उसके पहले कामों में सिनहनबोक (신한복) यानी नए हनबोक के विकास की परियोजना शामिल थी।

आज हनबोक किसे माना जाता है

2013 से हनबोक पहने किसी भी व्यक्ति को चार प्रमुख महलों, जोंगम्यो और जोसोन राजकीय मक़बरों में निःशुल्क प्रवेश मिलता है। आधिकारिक नियम माँगता है कि ऊपर और नीचे, दोनों कपड़े साथ हों और जोगोरी का कॉलर एक-दूसरे पर चढ़ने वाला हो; डोरियाँ हों या बटन, इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता, स्कर्ट की शैली पर कोई पाबंदी नहीं है, और पतलून सापोक बाजी (사폭바지) की चार-पल्लों वाली बनावट के अनुरूप होनी चाहिए। अकेली दुरुमागी इस शर्त पर खरी नहीं उतरती, पारंपरिक और समकालीन दोनों तरह के हनबोक गिने जाते हैं, और जुलाई 2019 से दूसरे लिंग का हनबोक भी मान्य है। ख़ुद एक सेट पहन लेने पर यह पूरा क्रम कहीं आसानी से दिखने लगता है।

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